Monday, 1 October 2018

गुलजार हुई विवेक के घर की गलियां, आखिर एक दिन पहले कहां थे सभी?



राजधानी में शुक्रवार देर रात एप्पल के एरिया सेल्स मैनेजर विवेक तिवारी की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। देर रात तकरीबन 1.30 बजे घटित हुई इस घटना के बाद कथिततौर पर पुलिस प्रशासन की ओर से भर्सक प्रयास किया गया कि किसी भी तरह से इस घटना को दबाया जा सके। इसके लिए प्रयास तो यहां तक हुआ कि घटना की एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी विवेक की महिला मित्र सना को घर में नजरबंद रखा गया। हालांकि पुलिस के इन सभी कृत्यों की गूंज बाद में दोपहर तकरीबन 12.45 पर एसएसपी कार्यालय में हुई प्रेसवार्ता के दौरान सुनाई दी। इस गूंज का आलम यह रहा कि तीन माह पूर्व राजधानी की कमान संभालने आए एसएसपी कलानिधि नैथानी को पीसी बीच में छोड़कर जाना पड़ा। वहीं इस मामले में पुलिस की जमकर भद्द उस दौरान पिटी जब शाम को आरोपी प्रशान्त कुमार अपने साथियों के साथ मामले में अपनी एफआईआर दर्ज करवाने पहुंचा।  जिसके बाद इस घटना ने एकाएक लखनऊ पुलिस प्रशासन और अधिकारियों के झूठे दावों पर सवाल खड़े कर दिये। इस दौरान पुलिस के जवानों ने ही उनकी कार्यप्रणाली की पोल खोली और कहा कि, "कप्तान साहब फोन नहीं उठा रहे और धमका रहे हैं। इसी के साथ आरोप तो यह भी लगा कि सीएम के दबाव में मामला नहीं दर्ज किया जा रहा।"

मामले में गौर करने वाली बात यह थी कि देर रात तकरीबन 1.30 बजे घटित हुई इस घटना के बाद शनिवार औऱ रविवार को पुलिस का कोई भी प्रदेश स्तरीय अधिकारी और न ही मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ही पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे। इस दौरान सिर्फ प्रदेश सरकार के दो मंत्री ही मौके पर पहुंचे। वहीं रविवार को जैसे ही मृतक विवेक का अंतिम संस्कार हुआ वैसे ही विवेक के घर के बाहर तो जैसे नामचीन लोगों और जिम्मेदारों का जमावड़ा लग गया।



विवेक के अंतिम संस्कार के बाद ही डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या ने विवेक के घर पहुंच परिजनों का दुख जाना। वहीं इस दौरान यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष राजबब्बर भी पीड़ित परिवार से उनका हालचाल जानने पहुंचे। रविवार को देर शाम से शुरु हुआ यह दौर सोमवार को भी जारी रहा। सोमवार सुबह ही सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पीड़ित परिवार से मिलकर आर्थिक सहायता का आश्वासन दिया। जबकि मामले में ठोस कदम उठाने के लिए प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को भी तलब किया। सोमवार सुबह से शुरु हुआ यह दौर शाम होते होते जारी रहा। इस बीच पूर्व सीएम अखिलेश यादव, राजेंद्र चौधरी और पंखुड़ी पाठक, राजधानी की मेयर संयुक्ता भाटिया ने पीड़ित परिवार के घर पहुंच हालचाल जाना। इसी के साथ कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल और मौजूदा सरकार में मंत्री रीता बहुगुणा जोशी, महेन्द्र नाथ पाण्डेय ने भी परिजनों से मुलाकात कर उनका हालचाल जाना।


लेकिन इस तरह अचानक दाह संस्कार के अगले दिन वीआईपी लोगों का पीड़ित परिवार के घऱ पहुंच हालचाल जानने के बाद एक सवाल जो हर आम आदमी कर रहा है वह यही है कि साहब एक दिन पहले कहां थे आप। फिर क्या किसी की मौत पर भी सियासत जरूरी। फिर अगर आप इस पलों को किसी के दुख में शामिल होना मानते हैं तो ऐसे पलों की तस्वीरें तो दुश्मन भी सोशल मीडिया पर साझा नहीं करते। आपके द्वारा वहां तस्वीरें पोस्ट करने को क्या कहा जाए। क्या सिर्फ यही माना जाए कि लोग इस तरह के पलों में भी सिर्फ एक कोरम पूरा करने जाते हैं जिससे कोई यह न कह सके कि आप वहां गये भी नहीं। या वास्तविकता में यह सच में प्रकट की जा रही भावनाएं है?

Sunday, 2 September 2018

अपने ही बिगाड़ रहे सपा, बसपा, भाजपा और कांग्रेस का खेल


आगामी लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर सभी सियासी दल अपनी—अपनी तैयारियों में लगे हुए हैं। तय रणनीति के मुताबिक सभी दल जमीनी स्तर पर अपनी-अपनी जोर आजमाइश कर रहे हैं। आलम यह है कि जहां सियासी दल एक ओर अन्य दलों के बड़े चेहरों को अपने साथ लाकर वोटों के गणित में बढ़त का खेल तैयार कर रहे हैं। वहीं, इसी बीच समाजवादी पार्टी के नेतृत्व से खफा शिवपाल यादव ने पार्टी से नाराजगी के बाद चुनावी सरगर्मी को और भी बढ़ा दिया है। समाजवादी सेक्युलर मोर्चा के गठन के बाद एक चीज जो सभी को साफ दिखाई दे रही है वह यह है कि भले ही शिवपाल आगामी चुनाव में खुद कोई बड़ी बढ़त न ले पाए, लेकिन वह अन्य दलों को नुकसान जरूर पहुंचाने वाले हैं। हालांकि राजनीतिक जानकारों का मत है कि यह सेक्युलर मोर्चा गठबंधन के लिए तो नहीं लेकिन भाजपा के लिए फायदेमंद जरूर होगा। वहीं, महागठबंधन से कथिततौर पर भयभीत भाजपा में भी शिवपाल के इस फैसले के बाद खुशी की झलकियां देखी जा सकती है। 

पूर्व लोकसभा चुनाव में मोदी लहर की बात की जाए तो यूपी की कुल 80 सीटों में से 71 सीटें भाजपा के खातें में गयी थीं। जबकि 2 सीट कांग्रेस, 2 अपना दल और 5 सीटें सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के खाते में थीं। हालांकि 3 सीटों पर उपचुनाव के बाद भाजपा को गोरखपुर, फूलपुर औऱ कैराना की सीट पर झटका लगा था। जिसके बाद विरोधी दलों की ओर से इस स्वर्णिम पल का जमकर स्वागत किया गया और सत्ताधारी भाजपा की आलोचनाओं में जमकर कसीदे पढ़े गयें। 


अपने बिगाड़ रहे खेल 

चुनाव से पहले जिस तरह राजनेता दल बदल कर रहे हैं वह कहीं न कहीं आगामी चुनाव को प्रभावित जरूर करने वाला है। हाल ही के दिनों की बात की जाए तो बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे राजेन्द्र गांधी कुशवाहा ने राष्ट्रीय अध्यक्ष औऱ प्रदेश अध्यक्ष डॉ महेन्द्रनाथ पांडेय को पत्र के जरिए अपना इस्तीफा भी दे दिया। वहीं बुलंदशहर से दिग्गज नेता और जिला पंचायत अध्यक्ष प्रदीप चौधरी के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए आवेदन पत्र दिया गया है। इस आवेदन पत्र में 53 में से 33 सदस्यों द्वारा आरोप लगाना साफ तौर पर पार्टी के भीतर की चल रही कलह को दिखाता है। 

भाजपा के अलावा सपा में भी राजनीतिक कलह किसी से छिपी नहीं हुई है। चुनाव से ठीक पहले जहां एक ओर शिवपाल यादव पार्टी से अलग होकर वरिष्ठ नेताओं के एक धड़े को अलग ले जा रहे है। वहीं पंखुड़ी पाठक जैसी युवा सोच वाली प्रवक्ता का पार्टी छोड़ शीर्ष नेतृत्व पर आरोप लगाना कहीं न कही युवाओं को पार्टी से अलग करने का काम कर रहा है। इन बड़े नामों के साथ ही इस लिस्ट में बस्ती से नेता और पूर्व जिला पंचायत सदस्य अरविन्द पाल और राजेश यादव जैसे तमाम अन्य नेताओं का पार्टी छोड़ना कहीं न कहीं चुनाव से पहले समस्या खड़ी कर सकता है। 

भले ही सपा और भाजपा से नाराज नेता कांग्रेस का दामन थाम रहे हों, लेकिन सच यह है कि कांग्रेस भी अपनी पार्टी के सभी नेताओं को एक सूत्र में बांध कर रख पाने में अक्षम है। आलम यह है कि मुख्यमंत्री खुद मंच से ऐलान कर रहे हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को उनकी पार्टी के लोग स्वीकार करने को तैयार नहीं है। वहीं राहुल के नेतृत्व में गठबंधन और सीटों को लेकर उठ रहे सवालों से भी कोई अनभिज्ञ नहीं है। 

लोकसभा चुनावों को लेकर हासिए पर चल रही बहुजन समाज पार्टी भी यूपी उपचुनाव के बाद से खासा उत्साह में है। लेकिन अन्दर बाहर का दौर उस पार्टी में भी पूरी तरह से जारी है। हाल ही में पूर्व मंत्री और डुमरियागंज सीट से पांच बार विधायक रह चुके मलिक कमाल यूसुफ ने भी पार्टी को अलविदा कह दिया। वहीं पूर्व चुनावों के परिणाम के बाद जाहिर तौर पर बसपा में सीट के बंटवारे और टिकट को लेकर कई अन्य नेता भी किनारा कर सकते है।


Tuesday, 28 August 2018

फर्श से अर्श तक का सफर तय करने के बाद एकाएक समाजवादी पुष्प से क्यों अलग हुई पंखुड़ी ?


खुदी को कर बुलंद इतना की हर तकदीर से पहले, खुदा बंदे से पूछे बता तेरी रजा क्या है। यह वही लाइन है जो पूर्व सपा प्रवक्ता पंखुड़ी पाठक की बेवसाइट पर दिखती है। लेकिन पार्टी के नए मीडिया प्रवक्ताओं की लिस्ट आने के बाद कद्दावर प्रवक्ता पंखुड़ी पाठक ने इस्तीफा देकर तथाकथित समाजवादी सिद्धान्तों से किनारा कर लिया। इसी के साथ उन्होंने आरोप भी लगाया कि मौजूदा समय में पार्टी में रहने से उनका दम घुटता है। मौजूदा समय में उन्हें वह विचारधारा पार्टी के भीतर कहीं दिखाई ही नहीं देती जिससे प्रभावित होकर वह पार्टी से जुड़ी थी। 



पंखुड़ी ने अपने ट्वीट में लिखा कि, "भारी मन से सभी साथियों को सूचित करना चाहती हूँ कि @samajwadiparty के साथ अपना सफ़र मैं अंत कर रही हूँ। 8 साल पहले विचारधारा व युवा नेतृत्व से प्रभावित हो कर मैं इस पार्टी से जुड़ी थी लेकिन आज ना वह विचारधारा दिखती है ना वह नेतृत्व। जिस तरह की राजनीति चल रही है उसमें अब दम घुटता है।" फिलहाल पंखुड़ी किसी भी पार्टी से न जुड़कर उच्च शिक्षा जारी रखने की बात कह रही है। 



8 साल पहले हुई थीं पार्टी में शामिल 


नोएडा की रहने वाली पंखुड़ी पाठक बतौर सपा प्रवक्ता राजनीतिक जगत में एक जाना माना नाम है। तकरीबन 8 साल पहले 2010 में पंखुड़ी सपा से जुड़ी थी। जिसके बाद पार्टी के भीतर जारी विवाद के चलते वह लिखती हैं कि, 'कभी जाति कभी धर्म तो कभी लिंग को ले कर जिस तरह की अभद्र टिप्पणियाँ लगातार की जाती हैं और पार्टी नेतृत्व सब कुछ जान कर भी शांत रहता है यह दिखता है कि नेतृत्व ने भी इस स्तर की राजनीति को स्वीकार कर लिया है। ऐसे माहौल में अपने स्वाभिमान के साथ समझौता कर के बने रहना अब मुमकिन नहीं है। मुझे पता है कि इसके बाद मेरे बारे में तरह तरह की अफ़वाहें फैलायी जाएँगी लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ कि मैं किसी भी राजनैतिक दल से सम्पर्क में नहीं हूँ ना ही किसी से जुड़ने का सोच रही हूँ।अन्य ज़िम्मेदारियों के चलते जो उच्च शिक्षा अधूरी रह थी अब उसे पूरा करने का प्रयास करूँगी।'



पंखुड़ी का नहीं था राजनैतिक बैकग्राउंड 

छात्र जीवन से सक्रिय राजनीति में कदम रखने वाली पंखुड़ी का इससे पहले कोई राजनैतिक बैकग्राउंड नहीं था। बावजूद इसके वह सपा में बेहद चर्चित चेहरे के तौर पर उभरी। 1992 में दिल्ली में जन्मी पंखुड़ी के पिता का नाम जेसी पाठक और माता का नाम आरती पाठक है। आरती पेशे से डॉक्टर हैं। इसी के साथ पंखुड़ी का एक छोटा भाई भी है जिसका नाम चिराग पाठक है।
* दिल्ली यूनिवर्सिटी के हंसराज कॉलेज से लॉ की स्टूडेंट थी पंखुड़ी।
* छात्र राजनीति के चलते 2010 में चुनाव जीतकर ज्वाइंट सेक्रेटरी बनी।
* साल 2013 में पंखुड़ी को लोहिया वाहिनी का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया।



कई मंत्री और विधायक करते हैं ट्वीटर पर फॉलो 


बतौर प्रवक्ता पंखुड़ी पाठक कि फैन फालोइंग किसी से भी कम नहीं है। मोदी सरकार के मंत्रियों से लेकर कांग्रेस और आप के कई सांसद, विधायक पंखुड़ी को ट्वीटर पर फॉलो करते हैं। पंखुड़ी की काबिलियत को देखते हुए ही समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन्हें समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया था।  



Saturday, 25 August 2018

Raksha Bandhan पर वैदिक राखी का है विशेष महत्व, इस मंत्र का जप होता है फलदाई


सदियों से रक्षा बंधन का त्योहार मनाया जाता रहा है। हालांकि समयानुसार इसमें कुछ बदलाव भी देखने को मिलते रहे हैं। बावजूद इसके इस त्योहार ने भाई बहन को प्रेम के एक सूत में बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस सदियों पुरानी परंपरा के साथ ही कुछ ऐसी चीजे भी हैं जो आज भी अपना अलग महत्व रखती हैं। इन्हीं चीजों में वैदिक राखी का रक्षाबंधन विशेष महत्व रखता है। रक्षाबंधन की वैदिक विधि में अगर किसी चीज के सबसे ज्यादा भूमिका रहती है तो वह रक्षा सूत्र यानि राखी की होती है। वैदिक राखी न सिर्फ आपको विरासत से जोड़ती है बल्कि यह पुरानी परम्पराओं को भी बांधे रखने का प्रयास करती है। इसी के साथ भाई के तरक्की के रास्ते में आने वाले अवरोधों को किनारे करती है। 

वैसे तो कच्चे सूत और हल्दी से बना हुआ रक्षासूत्र ही सबसे शुद्ध और शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि रक्षासूत्र को कलाई पर बांधा जाए तो इससे संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता का विकास होता है। इसी के साथ यह हमारे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचरण करता है। 




कैसे बनती है वैदिक राखी 


वैदिक राखी को बनाने के लिए मुख्यतः पांच चीजों की आवश्यकता होती है। जिसमें केसर, चंदन, दूर्वा, अक्षत और सरसों के दाने शामिल हैं। इन्हीं पांच चीजों को रेशम के कपड़े में बांध लाल रंग के कलावे में पिरो देने से वैदिक राखी तैयार होती है। रक्षासूत्र बांधने के समय इस मंत्र का उच्चारण अत्यंत फलदाई बताया गया है।
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल।।


Saturday, 5 May 2018

सुप्रीम कोर्ट ने किया साफ, विवाह योग्य उम्र नहीं तो लिव इन में रह सकते हैं वयस्क कपल


Lucknow. सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट का शादी रद्द करने का फैसला पलटते हुए एक बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट के मुताबिक विवाह हो जाने के बाद उसे रद्द नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने लिव इन को वैध मानते हुए कहा कि शादी के बाद भी अगर वर वधू में से किसी की भी उम्र विवाह योग्य उम्र से कम हो तो दोनों लिव इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं। 



पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार कोई नहीं छीन सकता 


सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का हक किसी से भी नहीं छीना जा सकता। ना कोर्ट, ना कोई व्यक्ति, संस्था या संगठन यह हक छीन सकता है। अगर युवक विवाह की उम्र 21 साल का नहीं हुआ है तो वह अपनी पत्नी के साथ लिव इन में रह सकता है। यह फैसला वधू पर भी लागू होता है। यदि उसकी उम्र विवाह योग्य नहीं है तो वह अपनी पति के साथ लिव इन में रह सकती है। इसके बाद वह विवाह योग्य अवस्था में आने पर चाहें विवाह करें या यूं ही साथ रहें। 


अदालत को नहीं निभानी चाहिए सुपर अभिभावक की भूमिका 


सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अतिरिक्त संसद ने भी घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 से महिलाओं के संरक्षण के प्रावधान तय कर दिये हैं। कोर्ट ने इसी की व्याख्या करते हुए कहा कि अदालत को मां की किसी भी तरह की भावना या पिता के अहंकार से प्रेरित होकर सुपर अभिभावक की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। 


किस मामले में हुई सुनवाई 


जिस मामले में कोर्ट ने यह टिप्पणी दी है वह मामला केरल में अप्रैल 2017 का है। जहां रहने वाली युवती की उम्र तो 19 वर्ष है लेकिन लड़के की उम्र 20 वर्ष यानि विवाह योग्य उम्र से 1 साल कम है। आपको बता दें कि प्रेमी युगल द्वारा स्वेच्छा से शादी के बाद लड़की के पिता ने बेटी के अपहरण का मुकदमा दूल्हे पर दर्ज करवाया था। जिस मामले में केरल उच्च न्यायालय ने लड़की को हैबियस कॉर्पस के तहत अदालत में पेश करने का आदेश दिया और पेशी के बाद विवाह को रदद् कर दिया। फिर लड़की को उसके पिता के सुपुर्द कर दिया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि दोनों ही हिंदू हैं अतः हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के तहत यह विवाह एक शून्य विवाह नहीं है। 

तस्वीरें खुद ही बयां कर रही सच्चाई, नेता किस तरह बांट रहे हैं दलितों का दर्द


Lucknow. दलित विरोधी छवि से जूझ रही भारतीय जनता पार्टी का दलितों को प्रभावित करने के लिए चला जा रहा कार्ड इन दिनों उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है। आलम यह है कि बीजेपी नेता खुद ही दलितों को घर जा जाकर किरकिरी करवा रहे हैं। आपको बताते चलें कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी एसटी एक्ट में किये गये बदलाव के बाद केन्द्र सरकार की दलित विरोधी छवि को बदलने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार के मंत्रियों समेत बीजेपी के कई नेता पुरजोर कोशिशों में लगे हुए हैं। लेकिन दलितों के घर खाना खाने, बात करने और फिर उनके घर पर सोने के साथ परेशानियों को जानने का यह सिलसिला उल्टा ही पड़ता जा रहा है।


आइये आपको बताते हैं कि कहां कहां करना पड़ा किरकिरी का सामना
योगी सरकार के मंत्री सुरेश राणा जब अलीगढ़ दलित के घर भोजन करने पहुंचे तो उनके लिए बाकायदा होटल से शाही खाना और मिनरल वाटर मंगाया गया।



यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या भी कानपुर के छाजा गांव में दलित के घर रात बिताने पहुंचे थे। लेकिन दलितों के दुख दर्द बांटने पहुंचे डिप्टी सीएम का इंतजार छुन्नी देवी को घंटो तक दरवाजे पर खड़े होकर करना पड़ा। इसके बाद इंटरनेट पर सामने आई तस्वीर में केशव प्रसाद मौर्या के पास बिसलेरी के बोतलों को देख लोगों ने सवाल खड़ा किया कि यह दलितों के प्रति लगाव है या महज दिखावा है।



यूपी के अलावा अगर बिहार की बात की जाए तो बेगूसराय में केन्द्रीय राज्य मंत्री एसएस अहलुवालिया ने दलित के घर पर खाना खाया जिसके बाद विवादों का दौर शुरु हो गया। मंत्री अहलुवालिया पर आरोप लगा कि उन्होंने बाहर से मंगवाकर खाना खाया। हालांकि इस दौरान जब मंत्री से खाना बाहर से मंगवाने की बात की गयी तो वह भड़क उठे।



किरकिरी की बात की जाए तो चुनावी सरगर्मी के दौरान बीजेपी में शामिल बुक्कल नवाब की शेयर की गयी तस्वीर को लेकर भी काफी चर्चाएं हुईं। आपको बताते चलें कि बुक्कल ने जो तस्वीर शेयर की उसमें वह चारपाई पर सोते हुए दिखे। हालांकि फोटो में उनके पीछे लोग खड़े होकर फोटो खिंचवाने का इंतजार कर रहे थे।

Wednesday, 2 May 2018

अपराध नियन्त्रण के दावे को लेकर सत्ता में आई सरकार के शासनकाल में निरंकुश पुलिस पर लगाम कैसे


 Lucknow. अपराध नियन्त्रण के अहम दावे को लेकर यूपी की सत्ता पर काबिज भाजपा सरकार के शासनकाल में निरंकुश पुलिसकर्मियों पर नियन्त्रण कैसे लगे यह सोचनीय विषय बना हुआ है। 19 मार्च 2017 को यूपी की सत्ता की सबसे ऊंची कुर्सी पर महंत योगी आदित्यनाथ के आसीन होने के बाद प्रदेश की आवाम को यह लगने लगा माने रामराज्य की स्थापना हो गयी है। शुरूआती दिनों की बात की जाए तो जनता का यह स्वप्न परवान चढ़ता गया। आपको बताते चले कि यह वही दौर था जब पूर्व सत्ताधारी पार्टी की जीत के बाद थाने के दरोगा और इंस्पेक्टर तक की टोपी को बंदूक की नाल पर उछाल दिया जाता था। इसके बाद सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं द्वारा थाने में घुसकर पुलिसकर्मियों को हड़काना और मिनटों में उनका तबादला करवाना तो उन दिनों आम बात ही हो चली थी। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सत्ता पर आसीन होने पर गुंडे और माफियाओं के लेकर की जा रही उद्घोषणाओं के बाद भले ही पुलिस का इकबाल बुलंद हुआ हुआ हो। लेकिन इस सत्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि एनकाउंटर के नाम पर पुलिस के हाथ में थमा दी गयी बंदूक भी मुख्यमंत्री, नेताओं और आलाधिकारियों के कंधे पर हाथ रखने के बाद बेलगाम हो गयी है। आलम यह है कि सामने आए मामलों के मुताबिक अगर किसी भी पुलिसकर्मी को किसी व्यक्ति का मिजाज जरा भी नागवांर गुजरे तो उसके सीने पर गोलियों की बौधार कर उसके खिलाफ मोटी फाइल तैयार कर दी जाती है। एण्टी रोमियों स्कवाण्ड के आरम्भ से सड़क पर घूमने वाले लड़कों पर अपनी धमक जमाते जमाते पुलिस अब इस दौर में पहुंच चुकी है कि यूपीकोका का साथ मिलने के बाद उसे बड़े से बड़े नाम को भी समाप्त करने में कोई गुरेज नहीं है। भले ही सत्ता पक्ष और अधिकारी अपनी कार्यप्रणाली को सही बताते हो तमाम तरह के दावे करते हो लेकिन हाल में सामने आए कुछ मामले तो फिलहाल अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। 

हाल ही में यूपी के इलाहाबाद में पुलिसवालों की गुंडागर्दी का वीडियो सीसीटीवी में कैद हुआ। जहां के तेलियरगंज इलाके एक कार सर्विस सेंटर के अंदर हुए विवाद में पुलिस हेड क्वार्टर इलाहाबाद में तैनात एक सिपाही ने पिस्टल से युवक पर गोली चला दी। लेकिन किसी तरह युवक बचा गया। 


डीजे पर डांस के दौरान लगा पैर तो मार दी गोली 

दूसरा मामला यूपी के फिरोजाबाद जनपद के अरावं का है। जहां डीजे पर डांस के दौरान पैर लगने से एक सिपाही ने 12 वर्षीय मानव को गोली मार दी। इसके बाद आरोपी सिपाही बच्चे का शव लेकर फरार हो गया। आरोपी सिपाही महेंद्र फर्रूखाबाद में ही तैनात है। 
घटना के बाद बच्चे के बिलखते परिजन 

पुलिस चौकी में मामूली विवाद में HCP की हत्या 

फतेहपुर में अप्रैल 2018 में ही पुलिस चौकी के अंदर हुए मामूली विवाद के बाद हेड कॉन्स्टेबल की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। विजयीपुर चौकी में ही तैनात इंचार्ज लक्ष्मीकांत सिंह सेंगर ने डेढ़ साल से तैनात हेड कॉन्स्टेबल दुर्गेश कुमार तिवारी की गोली मारकर हत्या कर दी। 
चौकी के अंदर हेड कॉन्स्टेबल को मारी गोली

नशे में दरोगा ने जिम ट्रेनर को मारी गोली

नोएडा में फरवरी माह में नशे में दरोगा ने बहन की सगाई से लौट रहे जिम ट्रेनर की गोली मारकर हत्या कर दी। जानकारी के मुताबिक चारों दोस्त स्कॉर्पियों से बहरामपुर से बहन की सगाई कर वापस आ रहे थे। इसी बीच जितेंद्र यादव की नोएडा के सेक्टर 122 में सीएनजी पर हुई कहासुनी के बाद विजयदर्शन नाम के पुलिसकर्मी ने गोली मारकर हत्या कर दी। 

मोटरसाइकिल लेकर भाग रहे युवक को मारी गोली

फरवरी माह में ही यूपी के सीतापुर में पुलिस ने मोटरसाइकिल लेकर भाग रहे युवक पर गोली चला दी। इस दौरान अपराधी की मौके पर ही मौत हो गयी। 


Sunday, 22 April 2018

...तो क्या गठबंधन के बाद एक साथ आए सपा-बसपा, IIT के छात्रों के इस कदम के बाद खो देंगे अपना अस्तित्व!



Lucknow. पथभ्रमित हो चुकी देश की राजनीति को वापस मार्ग पर लाने के लिए आईआईटी के 50 छात्रों ने एक नया बेड़ा उठाया है। इन सभी छात्रों ने अपनी अपनी नौकरी छोड़कर एक नये राजनीतिक दल का गठन किया है। बहुजन आजाद पार्टी(BAP) नाम से गठित इस पार्टी का मुख्य कार्य अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वार्ग को उनके अधिकार दिलाना है। वहीं इस पार्टी के अस्तित्व में आने के बाद राजनेताओं का मानना है इससे सबसे ज्यादा नुकसान सपा और बसपा को होगा। 


हालांकि बहुजन आजाद पार्टी(बीएपी) को अभी चुनाव आयोग से मंजूरी नहीं मिली है। वहीं इस बारे में ग्रुप के नेतृत्वकर्ता नवीन कुमार द्वारा पीटीआई को बताया गया कि हमारे ग्रुप के सभी 50 साथी अलग अलग आईटीआई से हैं। जिनका राजनीति को सही आयाम की ओर ले जाना है। वह जल्दबाजी कर चुनावी मैदान में नहीं कूदना चाहते हैं। न ही वह 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। नवीन का कहना है कि हम बड़ी इच्छाओं वाली छोटी पार्टी बनकर नहीं रहना चाहते हैं। इसके लिए 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव से शुरुआत करेंगे और अगले लोकसभा चुनाव का लक्ष्य रखेंगे। इसी के साथ नवीन ने बताया कि इस ग्रुप में मुख्यतः एससी, एसटी, और ओबीसी तबके के लोग शामिल हुए हैं। 


Thursday, 5 April 2018

#BlackBuckPoachingCase : सलमान की शिकायत करने वाले बिश्नोई समाज के लिए खास क्यों है काला हिरण


Lucknow. बॉलीवुड के सुपर स्टार सलमान खान को तकरीबन 20 सालों बाद जोधपुर की अदालत से दोषी करार दे दिया गया है। हालांकि इस मामले में कोर्ट ने अन्य आरोपियों को बरी कर दिया है। इस मामले में सलमान के साथ सैफ अली खान, सोनाली बेन्द्रे, तब्बू और नीलम को बरी कर दिया है। इस मामले में सलमान खान की शिकायत बिश्नोई समाज की ओर से की गयी थी। जिसके बाद उन्होंने 20 सालों तक इंसाफ की लड़ाई लड़ी। 
आपको बताते चलें कि बिश्नोई समाज की ओर से अक्टूबर 1998 में शिकायत दर्ज करवाने के बाद पुलिस और वन विभाग के अधिकारी हरकत में आए थे। समुदाय के लोगों का कहना था कि सलमान सहित बाकी सितारों ने हम साथ साथ हैं फिल्म की शूटिंग के दौरान भागोदा की धानी के पास दो काले हिरणों का शिकार किया था। शिकायतकर्ता के अनुसार जब लोगों को इस बारे में पता चला तो सभी सितारे जानवरों को छोड़कर फरार हो गये। 


क्यों बिश्नोई समाज ने की मामले की शिकायत


बिश्नोई समाज इकलौता ऐसा समाज है जिसका एकमात्र उद्देश्य प्रकृति की रक्षा करना होता है। तकरीबन 500 साल पुराने इस धर्म में 10 लाख से ज्यादा अनुयायी हैं। इसकी स्थापना भगवान जंबेश्वर ने की थी जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। 

कहा जाता है कि जंबेश्वर ने सात साल की उम्र तक एक भी शब्द नहीं बोला। जिसके बाद उनके पिता जी ने अजीबो गरीब व्यवहार को देख पंडित बुलवाया। उस दौरान पुजारी ने 64 दिये जलाने का उपाय बताया। काफी प्रयासों के बावजूद जब दिये नहीं जले तो जंबेश्वर ने कुए के पानी से दिये जलाए। 

काला हिरण ही क्यों अहम 


विश्नोई समाज के लोग प्रकृति से जुड़ी सभी चीजों को पवित्र मानते हैं। इसलिए वह गांव में मौजूद पेड़-पौधे, जंगली जीव, काला हिरण, चिंकारा, पक्षी सभी की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। इन सभी की रक्षा के लिए विश्नोई समाज के लोग कोई भी सीमा पार करने को तैयार रहते हैं। 


जानवरों की रक्षा के लिए जान तक गवां देते हैं बिश्नोई


बिश्नोई शिकारियों का मुकाबला लाठियों से करते हैं। वह हमेशा शिकारी को पकड़ फॉरेस्ट अथॉरिटी को दे देते हैं। आंकड़ो के अनुसार 20 सालों में तकरीबन 14 बिश्नोई जनवरों की रक्षा करते हुए जान गवां चुके हैं। आप बिश्नोई समाज की महिलाओं द्वारा चिंकारा और काले हिरणों को अपना दूध पिलाते भी देख सकते हैं। 

Sunday, 1 April 2018

आसार पर खरी उतरी कांग्रेस तो BJP के लिए होगी मुश्किल


Lucknow. कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए 17 अप्रैल को नामांकन और 12 मई को मतदान होना है। नामांकन और मतदान से पूर्व ही सामने आ रहे प्री पोल कहीं न कहीं यह इशारा कर रहे हैं कि एक बार फिर कांग्रेस अपना किला बचाने में कामयाब हो सकती है। सी फोर एजेंसी के सर्वे के अनुसार विधानसभा की कुल 224 सीटो में कांग्रेस को 109-120 सीटें मिलने की उम्मीद है। जबकि बीजेपी को 40 से 60 सीटें मिलती हुई दिख रही है।
सामने आए प्री पोल सर्वे के मुताबिक कांग्रेस बहुमत के आंकड़े 113 के आस पास ही दिख रही है। जिसके चलते चुनाव से पहले ही समर्थकों में खासा उत्साह है। अगर कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस पार्टी जीत दर्ज करने में सफल होती है तो इससे कहीं न कहीं पार्टी को चौतरफा फायदे होने के आसार हैं। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद कर्नाटक ही वह पहला राज्य होगा जहां उनके नेतृत्व में कांग्रेस परचम फहराने में सफल होगी। जाहिर तौर पर इससे पार्टी का मनोबल और राजनीति में राहुल का कद बढ़ेगा।
आपको बताते चलें कि इसी साल के अंत तक मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी चुनाव होने हैं। अगर पार्टी कर्नाटक में जीत दर्ज कर लेती है तो वह अन्य राज्यों में भी प्रचार के दौरान बेहतर प्रदर्शन करने की स्थिति में आ जाएगी। इन चुनावों में जीत के साथ कहीं न कहीं पार्टी यह संदेश देने में भी सफल हो जाएगी कि वह मोदी और शाह के विजय अभियान को रोकने में सक्षम हो गयी है।

अगर जीत जाती है बीजेपी तो क्या होगा बदलाव 

भले ही प्री पोल कांग्रेस के पक्ष में जाते हुए दिख रहे हों। लेकिन चुनाव से पहले बनने और बिगड़ने वाले समीकरणों का सही मायनों में मूल्यांकन तो मतगणना के दौरान ही होता है। फिलहाल अगर कर्नाटक चुनावों में भारतीय जनता पार्टी जीत जाती है तो कहीं न कहीं उपचुनावों में मिली हार का दबाव काफी हद तक कम हो जाएगा। हालांकि उपचुनावों में मिली हार का बदला तो पहले ही राज्यसभा चुनाव के परिणाम दे चुके हैं। फिर अगर कर्नाटक विजय होती है तो भाजपा यह साबित करने में सफल हो जाएगी कि विपक्षी दलों की एकजुटता के इतर उसका पलड़ा भारी है। 

Thursday, 29 March 2018

सपा बसपा की डूबती नैया को दिखा सहारा, अगर सफल हुआ यह फॉर्मूला तो बीजेपी की होगी बड़ी हार!


2019 के लोकसभा चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन चुनाव को लेकर खेमेबंदी शुरू हो गयी है। इसी खेमेबंदी के तहत बसपा सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को अहसास हो चुका है कि बीजेपी को सत्ता से बेदखल करना तो नए वजूद को तलाशना होगा। इसी नई तलाश में जो फॉर्मूला इजात किया गया है उसके मुताबिक अगर साइकिल, हाथी और शंख एक हो जाए तो कोई सामने नहीं टिक सकेगा।


यहां साइकिल और हाथी से मतलब समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी है। जो कि पहले से ही एक हो चुके हैं। इसके बाद अगला कदम शंख की ओर है। शंख का मतलब ब्राह्मणों से है। चूंकि दोनों ही दलों के नेता समझ चुकें हैं कि यदि यादव, दलित और ब्राह्मण एक साथ आ जाए तो सत्ता प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होगी।
समाजवादी खेमे का मानना है कि ब्राह्मण समुदाय बीजेपी से कहीं न कहीं नाराज चल रहा है। जिसका कारण प्रचण्ड बहुमत के बाद भी बीजेपी के ओर से बनाए गये मुख्यमंत्री का ब्राह्मण न होना है। जिसके बाद समाजवादी खेमे को लग रहा है कि बीजेपी के सवर्ण वोटबैंक में सेंध लगानी है तो ब्राह्मणों की नाराजगी का लाभ उठाते हुए उन्हें अपनी ओर मिलाया जा सकता है।


क्या कहते हैं आंकड़े
बताते चलें कि यूपी में इस समय विधानसभा के कुल 400 सदस्यों में 67 ब्राह्मण विधायक हैं। इनमें से 58 विधायक बीजेपी के पास है। जाहिर तौर पर अगर कोई भी खेमा ब्राह्मणों को लुभाने में सफल रहता है तो उसका सीधा प्रभाव बीजेपी पर ही पड़ेगा। 

Tuesday, 27 March 2018

खाप पंचायतों को सुप्रीम कोर्ट का आदेश, कहा - प्यार पर पहरा बर्दाश्त नहीं


Lucknow. लगातार सुनाए जा रहे तालिबानी फरमानों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रवैया अख्तियार करते हुए खाप पंचायतों को फटकार लगाई है। मंगलवार को कोर्ट ने दो बालिगों की रजामंदी के बाद हो रही शादी में खाप पंचायतों का किसी भी प्रकार के दखल को पूरी तरह से अवैध करार दिया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर औऱ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की बेंच ने खाप पंचायतों को निर्देश जारी करते हुए कपल्स की सुरक्षा को लेकर गाइडलाइन्स जारी की। इसी के साथ कोर्ट में यह भी साफ कर दिया कि यह गाइडलाइन्स तब तक जारी रहेंगी जब तक इस पर कोई कानून न बन जाए।



आपको बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट में शक्ति वाहिनी नाम की एऩजीओ ने खाप पंचायतों के खिलाफ याचिका दायर की थी। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट की ओर से केन्द्र औऱ राज्य सरकारों को ऑनर किलिंग के मामलों पर रोक लगाने के लिए दिशा निर्देश जारी किये गये है। कोर्ट ने इससे पहले भी सुनवाई के दौरान कहा था कि अगर दो बालिग शादी करने का फैसला करते हैं तो उसमें कोई भी दखल नहीं दे सकता है। कोई समाज, कोई पंचायत, या कोई व्यक्ति उन की शादी पर सवाल नहीं उठा सकता है।



Wednesday, 21 March 2018

खत्म नहीं हो रही बीजेपी की मुश्किले, मोदी मैजिक को बरकरार दिखाने के लिए जरूरी है यह जीत


यूपी उपचुनाव में हुई हार और राज्यसभा चुनाव से पहले सहयोगी दलों द्वारा खड़ी की जा रही समस्याओं से इतर बीजेपी के लिए एक और चुनौती बेसब्री से इंतजार कर रही है। यह चुनौती उन पांच लोकसभा की सीटों से संबंधित है जहां हाल ही में उपचुनाव होने हैं। 

गौरतलब है कि लोकसभा में बीजेपी के सदस्यों की संख्या में लगातार कमी हो रही है। 2014 के चुनाव के बाद बीजेपी के पास लोकसभा में 282 सदस्य थे। लेकिन फिलहाल सदस्यों की संख्या महज 274 पर सिमटकर रह गयी है। बताते चलें कि यह संख्या मैजिक फीगर में महज 2 ही ज्यादा है। फिर यदि पांच सीटों पर होने वाले उपचुनाव में गणित बिगड़ता है तो बीजेपी बहुमत के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर हो जाएगी। 

जिन पांच सीटों पर यह उपचुनाव होना है उसमें यूपी की कैराना लोकसभा सीट, महाराष्ट्र की पालघर और भंडारा गोदिया, जम्मू कश्मीर की अनंतनाग, नागालैंड की सीट शामिल है। यूपी की दो सीटों पर हुए उपचुनाव के बाद जहां एक ओर कैराना सीट को लेकर संशय बरकरार है। वहीं महाराष्ट्र की दो सीटें भी भाजपा के लिए अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। एक ओर जहां कांग्रेस लगातार शरद पवार के साथ गठबंधन के प्रयासों में लगी हुई है। वहीं दूसरी ओर शिवसेना भी भाजपा विरोधी स्वर प्रखर किये हुए है। इसी के साथ जम्मू कश्मीर की सीट महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री बनने और नागालैंड की सीट नेफ्यू रियो के मुख्यमंत्री बनने के बाद खाली हुई थी। 

सीटों पर जीत के साथ ही भाजपा के सामने बड़ी चुनौती यह भी है कि वह विपक्षी दलों के सामने मोदी मैजिक को कम होता हुआ नहीं दिखाना चाहते है। जबकि विपक्ष किसी भी तरह इन सीटों  पर जीत हासिल कर जनता को यह संदेश देने का प्रयास करेगा कि देशभर में बीजेपी विरोधी लहर दौड़ रही है। इसी के साथ इन सीटों पर विपक्ष की जीत के साथ ही भाजपा कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी गहरा असर पड़ेगा। 

Sunday, 4 March 2018

अमित शाह के तंज पर कांग्रेस नेता का पलटवार, राहुल गांधी से...


Lucknow. कांग्रेस को पूर्वोत्तर में मिली करारी हार के बाद विपक्षी दलों की ओर से राहुल गांधी की अनुपस्थिति पर जमकर आलोचना की जा रही हैं। मतगणना के दिन भी अनुपस्थित रहने पर बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने राहुल गांधी पर जमकर चुटकी ली। 


चुनावी परिणामों के सामने आने के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस अध्यक्ष पर चुटकी लेते हुए कहा कि, मुझे नहीं पता, वो एक व्हाट्सऐप पर मैसेज आया है कि इटली में चुनाव है. बताते चलें कि अमित शाह से पहले बीजेपी नेता गिरिराज सिंह औऱ मीनाक्षी लेखी भी राहुल गांधी पर जमकर तंज कस चुकी हैं। जिसके बाद कांग्रेसी नेता कमलनाथ ने तंज का जवाब देते हुए कहा कि राहुल गांधी की वजह से बीजेपी नर्वस है। बाकि राहुल लगातार हमारे संपर्क में हैं। इसके साथ ही कमलनाथ ने कहा कि राहुल गांधी 3 दिनों के लिए अपनी नानी से मिलने गये हैं। जो कि 93 वर्षीय हैं। 

बीजेपी नेताओं की ओर से ली जा रही चुटकी पर नाराजगी जताते हुए कमलनाथ ने कहा कि आज के जमाने में उन्हें(राहुल गांधी) को हर जगह उपस्थित रहने की आवश्यकता नहीं है। 

पीएम मोदी ने तोड़ दिया इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड


होली के अगले दिन ही सामने आए चुनावी परिणामों ने भारतीय जनता पार्टी के उत्साह में खासा वृर्द्धि कर दी है। त्रिपुरा में बीजेपी की ऐतिहासिक सफलता के पीछे पीएम मोदी के दमदार चुनावी अभियान और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी रणनीति को प्रमुख रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है। इसी जीत के साथ ही प्रधानमंत्री अपने नाम एक और रिकॉर्ड करने में कामयाब हो चुके हैं। 

खबरों की मानें तो जब से पीएम मोदी प्रधानमंत्री बने हैं तब से अब तक चार सालों में हुए कुल 21 चुनावों में बीजेपी ने 14 राज्यों में जीत हासिल की है। जीत का यह आंकड़ा खुद में ही अकथनीय है। लेकिन अगर पूर्व के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो इससे पहले इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए 4 साल में 19 चुनाव हुए थे। जिनमें कांग्रेस 13 राज्यों में चुनावी जीत हासिल करने में सफल रही थी। 

प्रधानमंत्री द्वारा लिये गये कई कठोर फैसलों के बावजूद मोदी लहर में चार सालों में कोई भी गिरावट दर्ज नहीं की गयी है। हालांकि गुजरात, राजस्थान औऱ मध्य प्रदेश से सामने आए चुनाव परिणामों के बाद मोदी लहर के फीका होने को लेकर कयास लगाए जा रहे थे। लेकिन त्रिपुरा से सामने आए चुनावी परिणामों में बीजेपी ने शून्य से सत्ता के सफर तक पहुंच कर काफी हद तक यह साफ कर दिया है कि चुनावी सफलता के आधार पर पीएम मोदी सबसे ताकतवर राजनेता है। 

Wednesday, 28 February 2018

अगर नहीं रखा इन 7 बातों का ध्यान तो, खतरनाक हो सकती है आपकी HOLI


त्योहारों के दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही आपके लिए घातक साबित हो सकती है। रंगो के त्योहार होली में लोग तमाम तरह की सतर्कता बरतते है लेकिन फिर भी अनजाने में या जल्दबाजी में कई बार वह ऐसी गलतियां कर देते हैं, जिनका खामियाजा उन्हें आगे चलकर भुगतना पड़ता है। 

जहां एक ओर होली का त्योहार नजदीक आता है वहीं बाजार में रौनक भी दोगुनी रफ्तार पकड़ने लगती है। इसी चकचौंध में घातक रसायनों का व्यापार भी पूरे जोरों पर होता है। बताते चलें कि रासायनिक रंगों में लेड ऑक्साइड, मरकरी सल्फाइड, एल्युमिनियम ब्रोमाइड और कॉपर सल्फेट जैसे घातक रसायन पाए जाते हैं। जो एलर्जी और तमाम तरह की परेशानियां पैदा करते हैं। 



कौन से रसायन पैदा करते है एलर्जी और कैसे करें बचाव


- होली खेलने के दौरान सिंथेटिक रंगों से बचकर रहें। इनमें लेड ऑक्साइड, कॉपर सल्फेड आदि भयानक कैमिकल पाए जाते हैं। जो एलर्जी और त्वचा में खुजली जैसी समस्याओं को जन्म देने के साथ अंधा तक बना देते हैं। इन कुप्रभावों से बचने के लिए रंगों की जगह हिना, हल्दी पाउडर, चंदन औऱ फूलों की पंखुड़ियों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।



- होली के दिन रंग खेलने से पूर्व शरीर पर नारियल का तेल या सरसों का तेल लगा लेना चाहिए। जिससे रंग त्वचा पर न चिपके। 

- होली में ज्यादा समय तक भीगे रहने के बाद त्वचा में घाव लगने और छिलने के चांस बढ़ जाते हैं। इस तरह की स्थिति से मुखातिब होने पर रंग खेलना बंद कर कटे हुए स्थान पर एंटीसेप्टिक का इस्तेमाल करना चाहिए। 



- रासायनिक रंगों के साथ ही होली पर गुब्बारों से भी बचकर रहना चाहिए। अक्सर यह आंखों में लगकर खासा नुकसान पहुंचाते है। जिससे आंखों की रौशनी तक जा सकती है। 

गुलजार हुई विवेक के घर की गलियां, आखिर एक दिन पहले कहां थे सभी?

राजधानी में शुक्रवार देर रात एप्पल के एरिया सेल्स मैनेजर विवेक तिवारी की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। देर रात तकरीबन 1.30 बजे घटित हुई इस घ...