LUCKNOW. उत्तर प्रदेश पुलिस योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद लगातार एनकाउंटर के जरिए अपराध नियंत्रण का दावा कर रही है। इन्ही एनकाउंटर को आगे बढ़ाने की कड़ी में बुधवार को यूपी के मथुरा से एक बड़ी वारदात सामने आई। वारदात में पुलिस और बदमाशों के बीच हुई फायरिंग में एक बच्चे की मौत हो गयी। बच्चे को लगी गोली पुलिस की ओर से चलाई गयी या बदमाशों की ओर से यह अभी भी चर्चा का विषय बना हुआ है। वहीं आक्रोशित कुछ ग्रामीण तो किसी भी बदमाश होने की बात से ही इंकार कर रहे हैं।
गौरतलब है कि तकरीबन 2 माह पहले नवंबर 2017 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः कानून व्यवस्था को लेकर पुलिस द्वारा किये जा रहे एनकाउंटर का संज्ञान लेते हुए यूपी सरकार को नोटिस जारी किया था। जारी किये गये नोटिस में मुख्य सचिव को 6 सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया गया था। यह नोटिस सीएम के उस बयान के बाद जारी हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि अपराधी या तो जेल जाएंगे या एनकाउंटर में मारे जाएंगे। आयोग का मानना था कि अगर कानून व्यवस्था बेहत गंभीर स्थिति में भी हो तो राज्य सरकार इस तरह की व्यवस्था नहीं दे सकती है जिसमें आरोपियों की एक्सट्रा ज्युडिशियल किलिंग की परमीशन दी जाए।
आयोग की ओर से इस तरह जवाब तलब करने के बाद बुधवार(17 जनवरी 2018) को सामने आई घटना में ग्रामीणों के अनुसार बदमाशों की आशंका में पुलिस की ओर से गोलीबारी की गयी। जिसमें आठ वर्षीय माधव की मौत हो गयी। माधव की मौत होते ही पुलिस वालों के होश उड़ गये। जिसके बाद बच्चे को लेकर आनन फानन में अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उसकी मौत हो गयी।
बच्चे की मौत की खबर सामने आने के बाद यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ द्वारा बच्चे के परिजनों को 5 लाख रूपये की आर्थिक सहायता देने की बात कही गयी है। फिलहाल बच्चे की मौत के बाद भी सियासत का दौर जारी है और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव की ओर से दोषियों पर कार्रवाई कर अभिभावकों को 50 लाख रूपये देने की अपील की गयी है। लेकिन इन सभी चीजों के इतर बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इस तरह एनकाउंटर किया जाना सही है या नहीं।


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